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सैलाना नगर परिषद अध्यक्ष को हाई कोर्ट से राहत, वित्तीय अधिकार बरकरार।

सैलाना नगर परिषद अध्यक्ष को हाई कोर्ट से राहत, वित्तीय अधिकार बरकरार।


सैलाना। सैलाना नगर परिषद अध्यक्ष चेतन्य शुक्ला के वित्तीय अधिकारों पर रोक लगाने से फिलहाल हाई कोर्ट ने इनकार कर दिया है। दो याचिकाकर्ताओं द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के बाद कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रखा था, जिसे गुरुवार 9 अप्रैल को सुनाते हुए अध्यक्ष के वित्तीय अधिकार बरकरार रखे गए। साथ ही अगली सुनवाई दो माह बाद निर्धारित की गई है।

इस मामले में खास बात यह रही कि कांग्रेस से जुड़े दो लोगों ने ही कांग्रेस के अध्यक्ष के खिलाफ याचिका दायर की थी। इसे गंभीरता से लेते हुए जिला कांग्रेस अध्यक्ष हर्षविजय गेहलोत ने दोनों याचिकाकर्ताओं को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।

क्या है पूरा मामला

निकाय अध्यक्षों के निर्वाचन के बाद शासन स्तर पर गजट नोटिफिकेशन जारी होना था, जो नहीं हो पाया। इसी तकनीकी चूक को आधार बनाकर प्रदेशभर में कई जगह अध्यक्षों के खिलाफ याचिकाएं दायर की गईं।

रतलाम जिले के जावरा में इसी आधार पर हाई कोर्ट ने निकाय अध्यक्ष के वित्तीय अधिकार वापस ले लिए थे। इसके बाद सैलाना में भी कांग्रेस पार्षद सलोनी प्रशांत मांडोत और वरिष्ठ कांग्रेस नेता जितेंद्र सिंह राठौड़ ने इंदौर हाई कोर्ट में याचिका दायर कर अध्यक्ष के वित्तीय अधिकार छीने जाने की मांग की।

अध्यक्ष ने रखा पक्ष

नगर परिषद अध्यक्ष चेतन्य शुक्ला ने अपने पक्ष में इंदौर के अधिवक्ता पीयूष माथुर और ऋषि तिवारी के माध्यम से जवाब प्रस्तुत किया। 6 अप्रैल को हुई बहस के बाद कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया था।

अब कोर्ट ने तत्काल वित्तीय अधिकार छीनने से इनकार करते हुए अध्यक्ष को राहत दी है।

विकास कार्यों को मिली राहत

नगर परिषद में वर्तमान में लगभग 42 करोड़ रुपये के विकास एवं निर्माण कार्य प्रगति पर हैं। यदि वित्तीय अधिकारों पर रोक लगती, तो इन कार्यों पर सीधा असर पड़ता।

कोर्ट के इस निर्णय से फिलहाल विकास कार्यों में बाधा नहीं आएगी।

बढ़ी राजनीतिक हलचल

अपने ही दल के अध्यक्ष के खिलाफ याचिका दायर होने से कांग्रेस संगठन में हलचल तेज हो गई है। जिला कांग्रेस कमेटी ने दोनों याचिकाकर्ताओं से तीन दिन में जवाब मांगा है, अन्यथा अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी दी गई है।

जनहित में फैसला

स्थानीय लोगों का मानना है कि जनप्रतिनिधि जनता के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं, जबकि प्रशासनिक अधिकारियों का दृष्टिकोण अलग होता है। ऐसे में कोर्ट का यह फैसला जनहित में माना जा रहा है।

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