आदिवासी विभाग के स्कूलों में सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद भी आवारा कुत्तों से सुरक्षा इंतजाम के कोई आदेश नहीं, कैसे होगा क्रियान्वयन?
सैलाना। नितेश राठौड़
लगता हैं, प्रदेश के आदिवासी विकास विभाग पर सुप्रीम कोर्ट का आदेश भी लागू नहीं होता या फिर इस विभाग ने ये मान लिया कि आदिवासी अंचल आवारा कुत्तों के आतंक से मुक्त होता हैं। दरअसल बीते महीनों में देश के सर्वोच्च न्यायालय सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों के काटने के मामलों से चिंतित हो कर देश के सभी स्कूलों में ऐसी चाक चौबंद व्यवस्था के निर्देश दिए कि संस्थाओं में कुत्तों के प्रवेश नहीं हो और उनके काटने की घटना नहीं घटित हो। कोर्ट की चिन्ता और आदेश को देखते हुए सीबीएसई और शिक्षा विभाग ने तो इस सम्बन्ध में कार्रवाई करते हुए अधीनस्थों को कुत्तों के काटने की घटनाओं को रोकने संबंधी सारी एहतियात बरतने के निर्देश दिए, भले ही वो केवल खानापूर्ति हो।पर कागजी घोड़े जरूर दौड़ाए गए। लेकिन आदिवासी विकास विभाग के आला अफसरों ने तो औपचारिकता के लिए भी ऐसा कोई आदेश जारी नहीं किया।
*कोर्ट का डंडा चला तो दौड़े कागजी घोड़े*
हालांकि आवारा कुत्तों के आतंक की समस्या कोई नई नहीं हैं। पर बीते वर्ष में सुप्रीम कोर्ट इस मामले में बहुत संवेदनशील नजर आया कि कुत्तों से देश में स्कूली बच्चे पूरी तरह से सुरक्षित रहे। कोर्ट ने इस मामले में जब स्पष्ट निर्देश दिए तो प्रशासन तंत्र में हड़कंप मचा। पर समस्या जस की तस रही। सिर्फ कागजी घोड़े दौड़े। खानापूर्ति हुई। दरअसल व्यवस्थाएं स्कूलों की इतनी कमजोर और लचर हैं कि चाह कर भी अंचल के स्कूलों के आसपास या क्लास रूम के इर्द गिर्द आवारा कुत्तों की आवाजाही रोकी ही नहीं जा सकती। अभी तक भी कागजी घोड़े ही दौड़ रहे हैं। वो भी कोर्ट के डर से।
*ये कारवाई हुई*
जैसे ही शीर्ष न्यायालय ने आवारा कुत्तों के स्कूलों के प्रवेश की रोकथाम संबंधी आदेश दिए वैसे ही संबंधित विभागों में हलचल मची। सीबीएसई ने नवम्बर 25 में ही आदेश जारी कर अपनी अधीनस्थ सभी शिक्षण संस्थाओं को व्यवस्थाएं चाक चौबंद करने के निर्देश दिए। लोक शिक्षण मध्यप्रदेश ने भी जरूरी कार्रवाई की। भले ही ये अलग बात है कि सिर्फ न्यायालयीन डर के कारण ये सब कुछ हुआ। 18 नवम्बर 25 को संचालक लोक शिक्षण मध्यप्रदेश डी एस कुशवाह के हस्ताक्षर से एक आदेश जारी किया गया कि प्रदेश के सभी स्कूलों के प्रधान अपने अपने स्कूलों में एक शिक्षक को नोडल अधिकारी बनाए जो आवारा कुत्तों के संस्था परिसर में प्रवेश को रोकने का कार्य देखे।
*तवज्जों नहीं दी तो ये रास्ता निकाला*
जब आला अधिकारी के आदेश को भी तवज्जो नहीं मिली तो फिर लोक शिक्षण ने दूसरा रास्ता निकाला।इन्हीं अधिकारी महोदय के हस्ताक्षर से 9 फरवरी 26 को एक और आदेश निकला जिसमें प्रदेश के शिक्षा विभाग के स्कूलों के संस्था प्रधानों को ही नोडल अधिकारी नियुक्त कर दिया कि वे अब आवारा श्वानों को भगाने का काम भी करे।और उन पर निगरानी रखे। इस आदेश में ये भी कहा गया कि चूंकि पिछले आदेश का पालन नहीं हुआ।इसलिए संस्था प्रधान ही नोडल अधिकारी नामांकित किए जाते हैं। यानी इस मान से कुत्ते भगाने की सीधी जिम्मेदारी प्राचार्यों,प्रधानाध्यापकों पर आन पड़ी।
*आदिवासी विकास विभाग में ऐसा कोई आदेश नहीं*
सीबीएसई और शिक्षा विभाग ने तो भले ही खानापूर्ति के लिए ही सही पर कुछ तो किया। पर आदिवासी विकास विभाग ने तो गोया ये भी जरूरी नहीं समझा। शायद विभाग ने ये मान लिया कि भले ही उनके स्कूलों में चारदीवारी हो, ना हो पर उनके विभाग के स्कूलों में आवारा कुत्ते आते ही नहीं या फिर उनकी संस्था के प्रमुख कुत्ते भगा ही देंगे, आए तो।
*कैसे क्रियान्वयन संभव*
जिले में शिक्षा विभाग और आदिवासी विकास विभाग के कुल 1694 प्राथमिक।माध्यमिक स्कूल, और 189 हाई स्कूल, हायर सेकेंडरी स्कूल संचालित हैं। इनमें से कुल 1109 प्राथमिक,माध्यमिक स्कूलों में और 101 हाई स्कूल, हायर सेकेंडरी स्कूलों में बाउंड्री वॉल ही नहीं हैं आदिवासी विकास विभाग के सभी स्कूल सैलाना/बाजना क्षेत्र में ही हैं।सैलाना के 211 प्राथमिक।माध्यमिक स्कूलों में और 7 हाई स्कूल हायर सेकेंडरी स्कूलों में बाउंड्री वॉल नहीं हैं। इसी प्रकार बाजना के 312 प्रथमिक माध्यमिक स्कूल और 13 हाई स्कूल और हायर सेकेंडरी स्कूल बिना चारदीवारी वाले हैं। शहरों के स्कूलों की व्यवस्था तो फिर भी संभाली जा सकती हैं पर आदिवासी अंचल के शिक्षालय तो जंगलों में ही होते हैं। उन्हें तो और अधिक सचेत,सावधान रहना होगा।
पर इस विभाग में ही ऐसे कोई आदेश ना होना निसंदेह दुर्भाग्यपूर्ण है।
*जिम्मेदारों का मत*
आदिवासी विकास विभाग की सहायक आयुक्त रंजना सिंह का कहना हैं कि ऊपर से ऐसा कोई आदेश इस मामले में हमारे पास नहीं हैं पर हम जिले में उच्चतम न्यायालय की मंशा अनुसार व्यवस्था चाक चौबंद रखते हैं। सैलाना के सांदीपनि स्कूल के प्राचार्य वीरेन्द्र मिंडा से जब सवाल किया गया तो उन्होंने भी ऐसे आदेश की जानकारी होने से इनकार किया पर पूरा ध्यान रखने की बात दोहराई।

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